अभी पढ़ रहे हैं
टू बी ऑर नॉट टू बी — ये सवाल नहीं है। पोलिनेटर्स को हमारे ध्यान की ज़रुरत है!

टू बी ऑर नॉट टू बी — ये सवाल नहीं है। पोलिनेटर्स को हमारे ध्यान की ज़रुरत है!

Akshay Jamwal
  • कीट माने जाने वाले ये पोलिनेटर अब खतरे में हैं और समय आ गया है कि हम इनकी कीमत पहचान कर इनका मूल्य समझें

मुझे हमेशा से कीड़े लुभाते हैं। उनके जीवन चक्र में उनके पूर्ण परिवर्तन से लेकर उनकी भरमार और हर जगह उपस्थिति तक, इन कीड़ों की हमारे ग्रह पर लाइफ़ फॉर्म के रूप में सफलता ने मुझे हमेशा चौंकाया है।

ये तथ्य देखें — कीड़े ही वो जानवर हैं जो एंटार्टिका के नेटिव हैं। अगर आप पृथ्वी के सारे टेरेस्ट्रियल एनिमल को लाइन अप करेंगे तो उनमें से हर चौथा बीटल होगा। एडल्ट मेफ़्लाई एक दिन से ज़्यादा नहीं रहती (कुछ केवल कुछ मिनट जीती हैं) जबकि टरमाइट क्वीन 50 साल से ज़्यादा जी सकती है। और एक और मज़ेदार बात — ड्रैगन फ़्लाई डायनासोर से 55 मिलियन साल पुरानी हैं! और आज भी बरक़रार हैं! 

ऐसे तथ्य मैं और दे सकता हूँ लेकिन फिर भी इन कीड़ों की ईकोसिस्टम में ज़रुरत लोगों की नज़र में कम ही रहती है। ये टेरेस्ट्रियल फ़ूड चैन का बेस होते हैं लेकिन हम में से अधिकतर लोग उनको आफ़त या पैस्ट की तरह मानते हैं। अगर उनको अकेला छोड़ दिया जाए तो वे बिलकुल नुकसान-रहित हैं। वैसे अगर उनको अकेला नहीं भी छोड़ा जाए तब भी वो कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। मैं यह कह सकता हूँ क्योंकि मैं 2015 से पोलिनेटर प्रोजेक्ट नाम की एक फ़ोटो सीरीज़ के लिए बीज़ की फ़ोटो ले रहा हूँ और मुझे कुछ भी नहीं हुआ। मेरे पोलिनेटर और ख़ासकर बीज़ के साथ इस काम ने मेरे लिए एक नयी दुनिया सामने रख दी है।

ड्रैगनफ्लाई डायनासोर से 55 मिलियन साल पुरानी हैं

जहां बीज़ ने एक पेड़ के छेद में अपना घर बना लिया था वहाँ से एक फुट दूर से ये फोटोज़ लिए गए हैं। जहां मैं काम करता हूँ उस जगह के पास ये पेड़ है

सारे बीज़ हनी बीज़ (मधुमक्खियाँ) नहीं होते हैं

जब भी मैं लोगों को बताता हूँ कि अपने फ़्री समय में मैं बीज़ की फ़ोटो लेता हूँ, पहले कुछ सवाल हमेशा हनी, हाइव या स्ट्रिंग्स के आस पास होते हैं। कभी-कभी लोग अपने रिश्तेदार और पहचान वालों की भी बात बताते हैं जो एपिआरिस्ट (मधुमक्खी पालने वाले) हैं। ये एक अच्छा समय होता हैं लोगों की ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए क्योंकि जब मैं कहता हूँ मेरा मतलब सिर्फ हनी बीज़ से नहीं है, उनकी दिलचस्पी जाग उठती है। उनके चेहरे के भावों से मुझे पता चल जाता है कि अगले कुछ मिनटों के लिए तो मेरे पास उनका ध्यान है।

ये बात ही कि सारे बीज़ हनी बीज़ नहीं हैं बहुत लोगों के लिए नयी है। आप ऑनलाइन भी देखेंगे तो आपको हनी बी के ही फ़ोटो, ग्राफ़िक और इमेज मिलेंगे। ये बात मुझे शुरू में परेशान करती थी लेकिन अब मैं इसे अपनी बात कहने के लिए इस्तेमाल करता हूँ। कुछ तथ्यों को फिर से देखते हैं — बीज़ की करीब 20,000 स्पीशीज़ में से हनी बी सिर्फ़ 7 स्पीशीज़ में होते हैं। इस नंबर को पूरे स्वरुप में देखते हैं। पूरी दुनिया की बर्ड स्पीशीज़ को मिला भी दें तो कुल नंबर करीब 10,000 है।

बीज़ की करीब 20,000 स्पीशीज़ में से हनी बी सिर्फ़ 7 स्पीशीज़ में होते हैं

A Blue-banded bee at work

नुकसानदायक होने से बहुत दूर, हनी बी और दूसरे, हमारी फ़ूड सिक्योरिटी के लिए ज़रूरी हैं। जिन अलग-अलग तरह के पौधों पर हम अपने फ़ूड के लिए निर्भर होते हैं वो बीज़ के साथ पिछले 150 मिलियन साल से विकसित हो रहे हैं। पौधे बीज़ की डाइवर्सिटी को ड्राइव करते हैं और बीज़ पौधों की।

बिना बढ़ा-चढ़ा के यह कहा जा सकता है कि जो अधिकतर फल और सब्ज़ियां हम खाते हैं — टमाटर, नारियल, लीची, नाशपाती, सेब या खीरा और सारी तरह की फलियां — इनको इन्सेक्ट ही पोलिनेट करते हैं। और इन्सेक्ट से मेरा ज़्यादा मतलब बीज़ ही हैं। फ़्लाई, बटरफ़्लाई और दूसरे एनिमल भी पोलिनेशन में मदद करते हैं लेकिन सच में बीज़ ही बीज़ नीज़ होते हैं (बीज़ नीज़ का मतलब है किसी चीज़ का बहुत अच्छा स्टैण्डर्ड क्योंकि माना जाता है कि बीज़ सारी अच्छी चीज़ें अपने घुटनों में इकट्ठा करते हैं )।

जो अधिकतर फल और सब्ज़ियां हम खाते हैं — टमाटर, नारियल, लीची, नाशपाती, सेब या खीरा और सारी तरह की फलियां — इनको इन्सेक्ट ही पोलिनेट करते हैं

बीज़ पोलिनेटर होते हैं

रिप्रोड्यूस करने के लिए पौधे फूल उगाते हैं जो उनके रिप्रोडक्टिव ऑर्गन सिस्टम होते हैं। फ्लावर में स्टामिन मेल पार्ट होता है जहां पोलिन बनता होता है। फ्लावर का फीमेल पार्ट ऑव्यूल होता है जहां पोलिन को पहुँचना होता है। पोलिन बिना मदद के ऑव्यूल तक नहीं पहुँच सकता है और यहां पर पोलिनेटर इन्सेक्ट काम आते हैं। कुछ पौधे खुद ही पोलिनेट कर सकते हैं, हवा पोलिन को उड़ा के उसे ऑव्यूल तक पहुंचाती है। कुछ देर बाद फ़र्टिलाइज़ेशन होता है और फल पैदा होता है। सबसे स्टेबल क्रॉप और सारी ग्रासेस (राइस, व्हीट और कॉर्न) विंड से पोलिनेट होते हैं।

फल और सब्ज़ियों को पोलिनेट करने के लिए इन्सेक्ट की ज़रुरत पड़ती है। इनमें से काफी पौधों के मेल हिस्से एक फूल में होते हैं और फीमेल हिस्से दूसरे फूल में। कुछ पौधे 'डाइईशॅस' होते हैं जिसका मतलब है कि पौधा पूरी तरह से मेल होता है या पूरी तरह से फीमेल और इसीलिए रिप्रोड्यूस करने के लिए सिर्फ पोलिनेटिंग इन्सेक्ट पर निर्भर होता है।

इन्सेक्ट किस डिग्री तक मदद कर सकते हैं ये अलग-अलग हो सकती है लेकिन पोलिनेटिंग इन्सेक्ट अधिकतर काम आने वाले जंतु होते हैं। जैसे टमाटर सेल्फ-पोलिनेट करते हैं लेकिन इंडिया में की गयी एक स्टडी में पाया गया कि बम्बल बी फल के साइज़ और क्रॉप यील्ड में मदद करते हैं।

फिर ये कहना ग़लत नहीं होगा कि बीज़ और दूसरे पोलिनेटिंग इन्सेक्ट की बायोस्फियर में लॉन्ग-टर्म भरमार, हमारी लॉन्ग-टर्म फ़ूड सिक्योरिटी के लिए सीधे तरीके से ज़िम्मेदार है। बीज़ खासकर इस काम में बहुत अच्छे रहते हैं। अपने जीवन के हर चरण पर वो फूलों पर निर्भर होते हैं और पौधों को इस प्रक्रिया में कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। ये दूसरे इन्सेक्ट पोलिनेटर जैसे फ़्लाई या बीटल के लिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये दोनों पूरी दुनिया में फसल के नुक्सान के लिए ज़िम्मेदार हैं। इनकी संख्या को कंट्रोल करके ज़्यादा फ़ूड उगाने की कोशिश में हमने पूरी इन्सेक्ट जनसँख्या को कम कर दिया है।

बीज़ अपने जीवन के हर चरण पर फूलों पर निर्भर होते हैं और पौधों को इस प्रक्रिया में कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

परेशान कर रही है कमी

सालों तक अधिकतर लोगों ने, जिनमे एंटोमोलॉजिस्ट और एक्सपर्ट शामिल हैं, ये माना था कि इंसेक्ट्स का लौटाव अनंत है। लेकिन हमने व्यवस्थित तरीके से उनके इतने सारे आवासों पर आक्रमण किया है और खेतों में इतना पेस्टिसाइड डाल दिया है कि अब उनका पतन शुरू हो गया है।

जर्मनी के नेचर रिज़र्व ने अपने फ़्लाइंग इन्सेक्ट में 75% कमी रिपोर्ट की है। यू.के. में दो बम्बल बी स्पीशीज़ पिछले पांच सालों में विलुप्त हो गयी हैं और काफ़ी और हो सकती हैं।

इंडिया में कमी के तो हमारे पास आंकड़ा भी नहीं हैं (हमने ये भी स्टडी नहीं किया है कि हमारे पास कितना है, कितना खो दिया है वो तो दूर की बात है)। पर ये बात मानना मुश्किल नहीं है कि कमी तो यहां भी हो रही है। एक कमी जो डॉक्यूमेंट हुई है उसका सम्बन्ध मिड-नाइनटीज़ में एपिस मेलिफेरा या यूरोपियन हनी बी को इंडियन सबकॉन्टिनेंट में लाने से है।

हमने व्यवस्थित तरीके से उनके इतने सारे आवासों पर आक्रमण किया है और खेतों में इतना पेस्टिसाइड डाल दिया है कि अब उनका पतन शुरू हो गया है।


बड़े स्तर पर कमर्शियल रियरिंग नेटिव स्पीशीज़ को मुश्किल में डाल रही है

एशिया की एपिस सेराना नाम की अपनी नेटिव हनी बीज़ की स्पीशीज़ है। इंडिया और एशिया के बी कीपर इस स्पीशीज़ को सदियों से काम में लेते आ रहे हैं। लेकिन पिछली सेंचुरी के अंत में ये बात बदल गयी। हमारी नेटिव स्पीशीज़ हमारे मौसम के लिए ज़्यादा अनुकूलित है लेकिन यूरोपीयन हनी बी के पास वो है जो अधिकतर बी कीपर्स को ज़्यादा पसंद आयेगा: ज़्यादा हनी। और ये सिर्फ कुछ ग्राम ज़्यादा नहीं है, काफ़ी है।

यूरोपीयन हनी बी इंडियन वाले से 2-3 गुना ज़्यादा हनी बनता है। यूरोप में साल के अंत के बहुत ठंडा मौसम और फ़ूड की कमी के कारण एपिस मेलिफेरा सर्दी में ज़्यादा हनी को इकठ्ठा करने में विकसित हो गया है। इसके कारण यूरोपियन हनी का एक बी हाइव हर साल 25-30 किलोग्राम हनी बनायेगा। जबकि इसका एशियाई भाई 8-10 किलोग्राम ही करेगा और इसीलिए ये बी कीपर्स के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। ये ज़्यादा हनी का लालच अपने ही दाम के साथ आता है। यूरोपियन बी अपने साथ बहुत सारी बीमारियाँ और पैरासाइट को लाया था और पिछली शताब्दी के अंत तक ये हमारी नेटिव स्पीशीज़ में फ़ैल गयी थीं।

उत्तर भारत में काफी जगहों पर एपिस सेराना की कॉलोनियों में 90% कमी हुई है। उस समय से अब वे उबर तो गए हैं पर कॉम्पटीशन मुश्किल है क्योंकि माना जा रहा है कि पंजाब और राजस्थान में अधिकार बी कीपर्स ने यूरोपियन बीज़ ही पालने शुरू कर दिए हैं। फ़ूड तो उतना ही है लेकिन किसी भी कमर्शियल कारण से रियर किये हुए जन्तुओं के अपने लॉन्ग-टर्म फ़ायदे होते हैं।

पंजाब और राजस्थान में अधिकार बी कीपर्स ने यूरोपियन बीज़ ही पालने शुरू कर दिए हैं।

वाइल्ड बी, हमारा साइलेंट हीरो

दूसरी तरफ़, वाइल्ड बीज़ का वो मूल्य नहीं है लेकिन वो हमारे साइलेंट हीरोज़ हैं जो पूरी दुनिया में पौधों के रहने में मदद करते हैं। लेकिन अब ये भी मुश्किल में हैं। लोगों को ये भी नहीं पता कि जो सब्ज़ियाँ और फल हर सुपरमार्केट में भरे रहते हैं वो कम दाम के इसीलिए होते हैं क्योंकि इंसेक्ट्स उनको बिना किसी दाम के पोलिनेट करते हैं।

ऐसा समय आ सकता है जब हमको कुछ पौधों को पोलिनेट करने के लिए भी लोगों को रखना पड़ेगा। अगर आपको ये बात बिलकुल बेतुकी लग रही है तो आप जान लें कि ये चीन के सिचुआन में हो रहा है जहां लैंड में पोलिनेटर ख़त्म हो गए हैं और लोगों को (हाँ, लोगों को) हाथों से पोलिनेट करना पड़ रहा है।

ये आने वाले समय की निशानी है (और साथ में फल और सब्ज़ियों के दामों के आसमान को छूने का) या हमारे इतिहास का छोटा पर दुखद समय है — ये बात हम पर निर्भर करती है।

आप इसमें कैसे मदद कर सकते हैं?

इसका सबसे आसान रास्ता यह है कि अपने एरिया के नेटिव पौधों को अपने गार्डन में लगाएँ और कुछ फ्लावरपॉट अपनी खिड़कियों पर सजायें। यह पक्का कर लें कि वे नेटिव फ्लॉवरिंग पौधें हैं और सिर्फ सजावट के (ऐसे पौधे जो केवल डेकोरेशन के लिए होते हैं और उनमें पोलिनेटर्ज़ के लिए नेक्टर नहीं होता है) नहीं हैं।

Better yet, grow a few herbs and spices. Basil, for example, is great at attracting little bees, particularly blue banded bees. Basil flowers several times during the year and you’re also likely to see butterflies and moths attend to the plants’ sweet offerings. Also, in case you haven’t heard: the leaves are great for pizza.

Ethico India podcast link: https://open.spotify.com/show/0Vb9kpUhYRil8f3F7lhRhh

Image Credits: Akshay Singh Jamwal

View Comments (0)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Scroll To Top

Eco-Conscious Shopping- एक्स्प्लोर करें

Shop Ethically- Earn Ethicoins

Shipping Flat Rs 99 for All Orders- एक्स्प्लोर करें